Sunday, October 15, 2017

1877 रू. में 2 कैलाश दर्शन : गुफा-किन्नर कैलाश-पोवारी (2 Kailash visited in just 1877 rs. : Gufa-Kinner kailash-Powari)

28 जुलाई 2017
“आँखों ने टिमटिमाते हुए अंगडाई ली और स्लीपिंग बैग के आँचल से झांककर गुफा से बाहर देखने की कौशिश शुरू करी, चेहरे ने बाहर आते ही ठंडी हवा का स्वाद चखा । कल की शाम कुछ ज्यादा ही हसीन हो गयी थी और रात भी । पूरी रात टांगों को सीधा होने का मौका ही नहीं मिला, जब भी दोनों को सीधा करना चाहा वैसे ही किसी-न-किसी की वजह से उन्हें फिर से टेढ़ा होना पड़ा । #टेड़ी_हैं_पर_मेरी_हैं ।

Friday, September 22, 2017

1877 रू. में 2 कैलाश दर्शन : पोवारी-गुफा (2 Kailash visited in just 1877 rs. : Powari - Gufa)

27 जुलाई 2017
“सतलुज नदी को लगभग 40 फुट ऊँचे टोकरीनुमा झूले से पार करके किन्नर कैलाश यात्रा के आखिरी गाँव ‘तंगलिंग’ में प्रवेश होता है जहां विश्व-प्रसिद्ध किन्नौरी सुनहरी सेबों की झलक दिखाई देती है । कई किमी. ऊँची चढ़ाई चढ़कर आप वहां पहुंचते हो जहां हरे-भरे ऊँचे दरख्तों का अस्तित्व रंग-बिरंगे फूलों की खूबसूरती में विलीन हो जाता है और जो कमी रह जाती है उसे यहाँ से दिखता जोरकांदेन पर्वत (6473 मी.) पूरी कर देता है । अनकही सुन्दरता को समेटे यह यात्रा आपको 4000 मी. से भी ऊपर ले जाती है जहां दर्शन होते हैं स्वर्ग के । स्वागत है धरती के स्वर्ग किन्नर कैलाश में” ।

Sunday, September 17, 2017

1877 रू. में 2 कैलाश दर्शन : ज्यूरी - पोवारी (2 Kailash visited in just 1877 rs. : Jeori - Powari)

26 जुलाई 2017 
“मैं पहले भी हिमालय में रह चुका हूँ, घूम चुका हूँ परन्तु आज सुबह उठकर जैसा महसूस हो रहा है वैसा अतीत में भी हुआ होगा लेकिन आज का एहसास अभी से जुड़ा है, मुझसे जुड़ा है, मेरी संतुष्टि से जुड़ा है । पहले कभी इतना पूर्ण महसूस नहीं हुआ । आज खुद को देख पाने में सक्षम हूँ, सक्षम हूँ इसका स्वाद चख पाने में जो होटो पर डोल रही है । संतुष्टि ही तुम्हारा नाम है मेरे भीतर” ।

Wednesday, September 13, 2017

1877 रू. में 2 कैलाश दर्शन : भीम तलाई – जाओं - ज्यूरी (2 Kailash visited in just 1877 rs : Bhim talai – Jaon - Jeori)

25 जुलाई 2017
“भारतीय हिमालय, ऊंचाई समुन्द्र तल से 3556 मीटर, आप टेंट के भीतर हैं और स्लीपिंग बैग में सो रहे हैं, बाहर तेज बारिश हो रही है, रह-रहकर बादलों के गर्जने की दहाड़ सुनाई दे रही है, टेंट के बाईं तरफ रंग-बिरंगे फूल धरती के सौंदर्य की शोभा बढ़ा रहे हैं और दाईं तरह मीठे पानी के झरने कुदरत की दीवानगी में बह रहे हैं, आपके टेंट के सामने 5000 मीटर ऊँचे विशाल बर्फीले पहाड़ शांत खड़े है ताकि आप उसके आँगन में बिना किसी चिंता के सो सकें” । अगर पहाड़ों में आकर भी आपके साथ ऐसा नहीं हो रहा है तो परेशान मत होना क्योंकि जल्द ही यह होने वाला है ।

Saturday, September 9, 2017

1877 रू. में 2 कैलाश दर्शन : भीम डुआरी - श्रीखंड महादेव – भीम तलाई (2 Kailash visited in just 1877 rupees : Bhim dwar – Shrikhand Mahadev – Bhim talai)

24 जुलाई 2017
दिन में तो लंगर वालों की उदारता देखने को मिली ही ऊपर में रात में उदारता ने गर्मी का रूप ले लिया । मेरा मतलब रात 10 बजे बाहर जब तेज बारिश शुरू हो चुकी थी तब मैं अपने स्लीपिंग बैग में घुस चुका था । अहा...अच्छा लगता है जब गर्मागर्म स्लीपिंग बैग अपने एहसास से आपको मदहोश कर दे और नींद के दरवाजे पर छोड़ दे लेकिन रात में जहाँ तापमान घटना चाहिए था वहीं तेजी से बढ़ना शुरू हो गया । शायद सपने में मुझे इस बात का एहसास हो चुका था कि अगले 30 सेकंड में अगर मैं स्लीपिंग बैग से बाहर नहीं आया तो मौत निश्चित है ।

Thursday, August 24, 2017

1877 रु. में 2 कैलाश दर्शन : थाचडू-भीम डुआरी (2 Kailash visited in 1877 rs. : Thachdu-Bhim Dwari)

23 जुलाई 2017
बाहर से छनकर आती रोशनी ने पलकों को खुलते ही चिकोटी काटी और नये दिन में स्वागत किया । पीली-सफ़ेद तिरपाल से बने टेंट के भीतर कोई 15 यात्री हरे-नीले कम्बलों में अभी भी नींद के आगोश में थे । बाहर यात्रियों की आवा-जाही शुरू हो चुकी थी और रह-रहकर ‘हर हर महादेव’, के जयकारें कानों को सुनाई दे रहे थे । न घड़ी, न मोबाइल और न ही किसी और प्रकार का डिवाइस पास था जो समय की पहचान करा सके । कुछ मिनटों बाद बगल में लेते एक लड़के को जब बार-बार करवटें बदलते देखा तो तुरंत पूछ लिया कि “भाई जी टाइम कितना हुआ होगा ?”, जवाब उनके कम्बल के भीतर से ही आया “साढ़े पांच” ।
जवाब मेरी सोच के अनुकूल नहीं था क्योंकि मैंने स्लीपिंग बैग में लेते-लेते अनुमान लगाया था कि समय 6 से 7 के बीच होगा पर अब जब सही समय का पता चल गया है तो क्यों न इस नये ताजा दिन की शुरुआत की जाये ।

Monday, August 21, 2017

1877 रु. में 2 कैलाश दर्शन : शिमला-थाचडू (2 Kailash visited in 1877 rs. : Shimla-Thachdu)

22 जुलाई 2017
40 मिनट इंतजार के बाद सफ़ेद-हरे रंग में रंगी HRTC की बस आई जिसके माथे पर हिंदी भाषा में “हिमाचल परिवहन” लिखा हुआ था । भीतर दुधिया लाइट जगमगा रही थी, ज्यादातर सवारियां यहीं उतर गयीं और जो बैठी रह गयीं उन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता था । अपने दोनों बैगों के साथ पिछले गेट से जैसे ही पायदान पर आया वैसे ही कंडक्टर की कड़वी आवाज सुनाई दी “अरे कहां चढ़ रहे हो ये बस कहीं नहीं जा रही है, चलो नीचे उतरो” । मेरे साथ चढ़ी कुछ सवारियां एक दूसरे की तरफ ऐसे देखने लगी जैसे सभी से जीने की आखिरी उम्मीद भी छीन ली गई हो । मेरे बोलने से पहले ही एक सफ़ेद बालों वाले 50-55 साल के अंकल जी को गुस्से का भयानक दौरा पड़ा और जोर से चीखे “जहां से ये बस जा रही है वहीँ जा रहे हैं और कहां, तू होता कौन है हमें उतारने वाला”, “रामपुर का बोर्ड तो लगा है बस के सामने”, उनकी आड़ में मैंने भी अपना गुस्सा दिखाया, जोकि गुस्सा कम चापलूसी ज्यादा लग रहा था ।

Friday, August 18, 2017

1877 रु. में 2 कैलाश दर्शन : बीड़-शिमला (2 Kailash visited in 1877 rs. : Bir-Shimla)

21 जुलाई 2017
“जब जेब में पैसे हों तो दिमाग अलग तरह से काम करता है और जब नहीं हों तो काम कम करता है भटकता ज्यादा है । मैं भी इसी भूल-भुलैया में लम्बे समय तक भटकता रहा । अब जो याद है वो ये कि 'कभी अकेले घूमता था खुद के साथ दीवानों की तरह' । फरवरी 2016 के बाद बहुत सी जगहें घुमा लेकिन जहां कदम अकेले चले वो जगह थी चादर ट्रैक” ।

Friday, June 9, 2017

पराशर झील - जब एडवेंचर सजा बन गया (फोटो स्टोरी, भाग -3), Prashar Lake - When the adventure becomes trouble (Photo Story, Part - 3)


“अगर आपको नींद बहुत अच्छी और गहरी आती है तो समझ लेना आप काफी शारीरिक परिश्रम करते है, और यही कल रात हमारे साथ हुआ । ऑंखें खोलने से पहले कल के चुनौतीपूर्ण दिन को श्रधांजलि दी । बाहर किरणें निकल आई हैं और भीतर उम्मीदों का सूरज । उठते ही तीनों ने जो आपस में बांटी वो थी “सच्ची मुस्कान” । सूरज की किरणों पर फिसलती छोटी, भोली, प्यारी, बस एक “कट्टो मुस्कान” । कुदरत अपनी उपस्थिति की पावन ऊर्जा हमारे नाम कर रही थी । हम तो सिर्फ उसकी ऊर्जा ही अपने नाम कर सके जबकि वो सम्पूर्ण खुद को हमपर लुटाकर हम ही बन बैठी” । सूरज की गर्मी, बर्फ की ठंडक, पहाड़ों की कतार, पेड़ों की रौनक, आज सबकुछ सजीव लग रहा है, आज सब ताजा हो गया है, आज हम जिंदा हो गये हैं” ।

Saturday, June 3, 2017

पराशर झील - जब एडवेंचर सजा बन गया (फोटो स्टोरी, भाग -2), Prashar Lake - When the adventure becomes trouble (Photo Story, Part - 2)

भाग-1 यहाँ क्लिक करें >>

      मंडी से खड़ी चढ़ाई, लैंड-स्लाइड, बारिश और अब बागी के बस स्टैंड में 2 टैंटों में हम 3 । शाम को पास की एकमात्र दुकान पर जब हमने डिनर किया तभी स्थानियों ने हमें चेतावनी दे दी कि “ऐसे खराब मौसम में आगे जाना खतरनाक होगा” । हम खाते-खाते उनकी चेतावनियाँ सुनते रहे और अब बिना एडवेंचर के वापस जाना हमारे साथ जात्ती होगी । चाय-शॉप में ही हमने मीटिंग की कि “पराशर लेक यहाँ से सिर्फ 18-19 किमी. ही रह गई है अगर कल जल्दी निकले तो ज्यादा-से-ज्यादा झील पर हम 3 घंटे में पहुँच सकते हैं और 1 घंटे में वापस यहाँ आ सकते हैं” । “सारा सामान यहीं छोड़ देंगे ताकि आना-जाना जल्दी और आसान हो सके”, बोलकर मैंने चाय वाले को खाने के पैसे दिए । हम इंसान ही थे लेकिन दुकान में बैठे सभी लोग हमारी बातें सुनकर ऐसे मुंह बना रहे थे जैसे कल हिमाचल सरकार उन्हें हमारे रेस्क्यू पर भेजेगी, वो भी फ्री । आज हमने 30 किमी. साइकिलिंग की, बाकी का सफ़र कल सुबह शुरू होगा चाहे बारिश रुके या नहीं ।

Monday, May 15, 2017

पराशर झील - जब एडवेंचर सजा बन गया (फोटो स्टोरी, भाग -1), Prashar Lake - When the adventure becomes trouble (Photo Story, Part - 1)


      तीन दोस्त एडवेंचर के लालच में साइकिल पर दिल्ली से पराशर झील पहुंचे जहां उनका स्वागत लैंड स्लाइड, बारिश, ओलों, उफनती नदी और बर्फीले तूफ़ान ने किया । भारी बर्फ़बारी के बीच जब कोई भी न मिले मदद के लिए, जब मन पर हाइपोथर्मिया, फ्रोसबाईट और ठण्ड से मर जाने का साया मंडराने लगे, जब आगे बढ़ना भी उतना ही खतरनाक लगे जितना पीछे हटना तब ऐसा क्या होता है जो हमें जिंदा रहने को मजबूर करता है ?। तो चलो ले चलता हूँ चित्रों की सहायता से ऐसी ही एक यात्रा पर जहां एडवेंचर सजा बन गया ।

Wednesday, May 3, 2017

यमुनोत्री : 100 रु के कमरे में रोया, भाग-2, Yamunotri : Cried in the room of Rs. 100, Part-2

बेहिसाब सुन्दरता को देखकर मेरा खुला मुंह देखकर किसी ने पीछे से पुकारा है न सुंदर”, मैंने भी पीछे बिना देखे कहा बिना किसी शक के। पीछे वाले व्यक्ति ने जब अगला सवाल किया पहली बार आये हो यहाँ भाई जी ?”, तब मैं उनकी तरफ पलटा और पुरे आत्मविश्वास के साथ कहा बिलकुल पहली बार, यूँ समझ लीजिये कि एकदम नौसिखिया हूँ। जिस तरह मैं पहाड़ों की तरफ मोहित हुआ हूँ उससे तो यही साबित होता है जैसे पिछले किसी भी जन्म में मेरा पाला पहाड़ों से नहीं पड़ा ।

Wednesday, April 19, 2017

यमुनोत्री : 100 रु के कमरे में रोया, भाग-1, Yamunotri : Cried in the room of Rs. 100, Part-1

नई नौकरी पकड़े हुए अभी 6 महीने ही हुए थे और छोड़ने में 6 मिनट भी नहीं लगे । परिवार में हुई एक के बाद अचानक 2 लोगों की मृत्यु ने पुरे परिवार के साथ मुझे भी तोड़ दिया था । जितने भी लोगों ने अपने करीबी लोगों की आखिरी सांसों को बेहद करीब से महसूस किया है वो इसे समझ सकते है कि कैसे ये समय हमें तन और मन से विक्लांग बना देता है और मेरी ही तरह सभी लोग इस बात से भी सहमत होंगे कि समय सभी घावों को भर देता है परंतु थोड़ा समय जरुर लेता है । जहां घर पर सभी के मन जो हुआ है उसे फिर से अन-हुआ करना चाहते थे वहीँ मेरी पतंग की डोर यहाँ से टूटकर हिमालय के शिखरों पर उड़ना चाह रही थी । लगातार एक महीने शौक के भंवर में उड़ने के बाद आख़िरकार डोर टूट गई और पतंग “यमुनोत्री” में गिरी पहुंच गई ।

Thursday, April 13, 2017

मेरी पहली यात्रा कौनसी थी ? Which was my first trip?

ना जाने कितना टाइम बीता, पता नहीं....
ना जाने कितने ब्लॉग पढ़े, याद नहीं......
लाखों-करोड़ों विचार आए, पकड़े नहीं.....
और अब आलम ये है की बैठा हूँ सवारने ।

Friday, April 7, 2017

नैनीताल के चश्मे (फोटो स्टोरी) Nainital's Glasses (Photo story)

एक समय की बात है जब मेरी नई-नई पहाड़ों से जान-पहचान हुई थी । मेरे दो दोस्त इस जान-पहचान को रिश्तेदारी में बदलने के लिए मुझे नैनीताल ले जाना चाहते थे लेकिन मैंने मना कर दिया क्योंकि मेरा सारा काम ऑफिस के भूतिया कंप्यूटर पर ही होता था नहीं तो कौन कमबख्त रिश्तेदारी नहीं बनाना चाहता था और वो भी पहाड़ों से लेकिन समस्या थी बरगद से पेड़ सा भीमकाय कंप्यूटर जिसे बैग में डालकर नैनीताल नहीं ले जाया जा सकता था । समस्या का हाल मास्टर साब ने सुझाया जब उन्होंने अपना लैपटॉप साथ लेकर चलने बात कही । मास्टर का लैपटॉप बॉस के सामने लालीपॉप की तरह रख दिया जिसे मुहं में डालते ही उन्होंने “हाँ” की मोहर लगा दी इस सफ़र के लिए ।

Wednesday, March 15, 2017

बद्रीनाथ का भूत, भाग-2 (Ghost of Badrinath, Part-2)

पिछली रात सोने से पहले की गई बैठक के अनुसार हमनें सुबह 5 बजे उठकर तेज-तर्रार तरीके से फ्रेश होकर साढ़े पांच बजे होटल छोड़ा । सबकुछ ठीक था लेकिन इतनी सुबह कौन उठता है वो भी सुबह के 5 बजे, प्रेशर तो किसी को आया नहीं बस मुंह-धोकर सभी गाड़ी में लध गये । बाहर ठंडी हवा कहर ढा रही थी और भीतर बिना फ्रेश हुए 4 फरिश्ते नाक के बाल जला रहे थे । आखिर इंसान ही इंसान के काम आता है और यहाँ यह कहावत सिद्ध हो गयी जब चारों ने अपनी-2 जान बचाने के लिए ओस से ढंके शीशे नीचे कर लिये ।

Saturday, March 11, 2017

बद्रीनाथ का भूत, भाग-1 (Ghost of Badrinath, Part-1)

लोग कहते हैं कि किसी भी यात्रा पर जाने लिए वहां से बुलावा आना जरुरी है नहीं तो आप वहां जा ही नहीं सकते । बुलावे-वुलावे का तो पता नहीं हाँ लेकिन इतना जरुर पता था कि लगातार आती तीन छुट्टियाँ को मेरे दोस्त यूँ ही बर्बाद नहीं करना चाहते थे । उनके चेहरे की ख़ुशी देखकर ऐसा लगता जैसे इन तीन दिनों में दोनों को मोक्ष मिल जायेगा और शायद साथ में मुझे भी । वो अपनी बातों में डूबकर इतना उत्साह दिखाते अगर उस वक्त उन्हें कोमन्वेल्थ गेम्स में भाग लेते एथलीटस भी देख ले तो 2 गोल्ड पक्के कर लें ।