25-जनवरी-2016,
10 अक्टूबर 2014 को आई.आई.टी. दिल्ली के इंटरनेट का फ्री इस्तेमाल करते हुए हम तीनों ने चादर ट्रैक की रिटर्न हवाई टिकट बुक करी । 3 महीने पहले टिकट बुक करने पर प्रति-व्यक्ति दिल्ली से लेह का वापसी हवाई टिकट 5500 रु. में मिल गया । पेमेंट मेरे कार्ड से हुई, 16500 रु. एकसाथ जाने पर मोबाइल के साथ-साथ दिल भी गर्म होने लगा । #सर्द_गर्म_दिल
हम चार लोगों ने प्लान बनाया पूरे चादर ट्रैक को चिलिंग से पदुम तक अकेले चलने का । इसके तहत हमने आई.आई.टी. दिल्ली के कैंटीन में लगातार कई दिन झक्क मारी, जिसमें यह तय हुआ कि “हम चारों बिना किसी गाइड और पार्टर के जाऐंगे। सारा राशन लेह से ही खरीद लेंगे और अगर सामान भारी हो गया तो स्लैज खरीद लेंगे"। ये सब बोलते हुए धनुष एकदम मोटिवेशनल स्पीकर से कम नहीं लग रहा था, सबकुछ ठीक था लेकिन ये स्लैज बीच में कहां से आ गई? । लगता है इंजीनियर जोश-जोश में बोल गया ।
हम चार में पहला मैं (कन्फ्यूज कॉमन मैन), दूसरा दिल्ली आई.आई.टी का इंजीनियर (धनुष के. देव), तीसरा भी दिल्ली आई.आई.टी का इंजीनियर (सनोज वादियोदन), और चौथा इन दोनों का दोस्त नवीन । धीरे धीरे तैयारियाँ जोर पकड़ने लगी और अगले ही महीने 2 में से एक इंजीनियर ने जाने के मना कर दिया, हौसले टूटे नहीं क्योंकि तीन भी इस ट्रैक के लिए काफी हैं । वक्त आगे बढ़ता गया और 9 जनवरी 2015 आ गयी जिस दिन हमें निकलना था । बुरी खबर ने स्वागत किया एक और इंजीनियर ने जाने से मना कर दिया और चौथे साथी ने लेह की बजाय श्रीनगर जाना बेहतर समझा, अब तक अपना इंजीनियर कौम से विश्वास उठ चुका था ।
मन में चादर टूट चुकी थी क्योंकि अकेले मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि -20...25 डिग्री का सामना कर सकूँ । तो तय हो गया कि इस साल हममें से कोई भी चादर पर नहीं जा रहा है । बेशक प्लान कैंसिल हो गया लेकिन इस वजह से चादर के लिए मेरी सारी चैक लिस्ट पूरी हो गयी जो शायद किसी और साल काम आ सके ।
2014 जाते-जाते उम्मीदों को तोड़ गया और चादर को भी। न जाने क्या हुआ कि चादर ट्रैक बंद हो गया इस साल के लिए । दिल को समझाने के लिए ये अच्छा बहाना था कि "अच्छा हुआ जो मैं नहीं गया वर्ना अपन भी चादर में लैंड कर जाते"। 2015 में तब तक चादर का नशा चढ़ा रहा जब तक मैंने इसकी टिकट फिर से बुक नहीं कर दी । 15 नवम्बर 2015 वो दिन था जब फिर से उम्मीदों का मेढ़क दिल के नालों में उछलने लगा । बेशक इस बार मैं अकेले जाना चाहता था लेकिन डर भी तो कोई चीज़ होती है, तो एक साथी इस बार भी तैयार हो गया "अरुण जसरोटिया"।
इस बार का प्रति-व्यक्ति रिटर्न टिकट 6000 में बुक हुआ और तारीख तय हुई 25 जनवरी 2016 । दोनों ने मिलकर हर कोण पर बात की और चैक लिस्ट पर जमकर काम शुरू किया । अरुण ने खरीदारी शुरू कर दी -25 डिग्री के लिए जबकि मेरी शॉपिंग पिछले साल ही पूरी हो गयी थी, इस बार तो बस हर सामान को रकसैक में ठूंसना बाकी रह गया।
तैयारियों के हिसाब से हमने कुछ पॉइंट्स तय किये जैसे:
1. स्लीपिंग बैग लेह से रेंट पर लेंगे
2. - तापमान के लिए फॉर्म वाला मोटा मैट्रेस (Mattress) लेह से रेंट पर लेंगे
3. एक 2 मैन टेंट भी वहीँ से रेंट पर लेंगे
4. और लेह में रूम का बंदोबस्त अरुण करवा देगा, कोई उसके जानने वाले हैं लेह में जो आर्मी में हैं ।
उपरोक्त के अलावा बाकी सारा छोटा-मोटा सामान खाट पर इकठ्ठा करके 45 लीटर के रकसैक में भर लिया । अरुण जम्मू से ट्रेन लेकर दिल्ली आयेगा और हम दोनों एकसाथ मेरे घर से लेह के लिए निकलेंगे । थोड़ी समस्या थी फ्लाइट में लगेज के वजन को लेकर इसलिए तरीका ये निकाला कि 3-3 जोड़ी पहले ही पहनकर जायेंगे जिससे बैग हल्का हो जायेगा ।
23 जनवरी एक बार फिर दोनों ने फ़ोन पर बात करी और चैक लिस्ट को क्रॉस चेक किया । 24 जनवरी की रात अरुण ट्रेन में था और जैसे ही पठानकोट क्रॉस किया तभी दर्दनाक पथरी के दर्द के उसे घेर लिया। दर्द इतना ज्यादा था कि उसने जैसे-तैसे खुद को स्टेशन पर उतारा और घर पर कॉल करके अपने परिवार को अपनी मौजूदा हालत की खबर दी।
रात में अरुण मुझे सिर्फ एस.एम.एस (SMS) ही कर पाया जिसमें उसने लिखा "बाबा जी सॉरी मैं नहीं आ पाउँगा, स्टोन के दर्द की वजह से मुझे वापस घर जाना पड़ गया"। ये एस.एम.एस मुझे देर रात मिला और सच बताऊँ इस बार मुझे ज़रा भी बुरा नहीं लगा क्योंकि पिछली बार की तुलना में इस बार मैं ज्यादा तैयार था किसी ही हालात के लिए । अरुण को "टेक केयर" का रिप्लाई किया और सुबह 3:30 की कैब बुक करके सो गया ।
सुबह 2:30 उठकर मुंह-हाथ धोकर तैयार हुआ ही था कि कैब आ गयी । 25 जनवरी सुबह 3:30 बजे चादर पर चलने का सपना आँखों में सजा कर चल पड़ा इंदिरा गाँधी एअरपोर्ट टी-3 की ओर । कैब ने एअरपोर्ट 3:58 पर उतारा ।
एक प्रॉब्लम और थी जो काफी समय से मुझे दीमग की तरह खाए जा रही थी और वो थी मेरी बढ़ी हुई दाढ़ी-मूंछ । यह मेरा पहला हवाई सफ़र होने वाला है इसलिए मुझे जरा भी ज्ञान नहीं है कि किस प्रकार के हुलिये वाले इन्सान को एअरपोर्ट में घुसने देते हैं । “वापस तो नहीं भेजेंगे, अगर भेज दिया तो?”, दाढ़ी नौचते हुए मैं एअरपोर्ट के गेट की तरफ बढ़ा । यह समस्या इसलिए थी क्योंकि मेरी पर्सनल आई.डी पर चेहरा एकदम छिले हुए अंडे जैसा है । बार-बार डर लग रहा था कि अगर आई.डी से चेहरा मैच नहीं हुआ तो क्या होगा ? ।
गेट पर खड़े खाकी वर्दी में पुलिस वाले को देखते ही मुझे 5500 रु. के जाने का डर दिखाई देने लगा, इसी डर की वजह से बिना कुछ सोचे-समझे मैंने तुरंत अपना ब्लैक-एंड-वाइट वोटर आई-डी कार्ड निकालकर पसीने से भीगते दाहिने हाथ में ले लिया । जहां एक तरफ डर से दिल कांप रहा था वहीँ ठण्ड में कांपती मेरी एक जोड़ी पर्सनल टाँगे साथ छोड़ रही थी । 5 कदम सरकते ही जिस तेजी से पुलिस वाले ने मुझे देखा उतनी ही तेजी से मैंने गर्म मोटे पायजामे की बाईं जेब से दिल्ली से लेह का बुकिंग प्रिंटआउट निकाल लिया, इस उम्मीद में कि पुलिस वाला इसे देखेगा और ख़ुशी-ख़ुशी मुझे एअरपोर्ट में जाने देगा ।
4:05 पर हम दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने हुए,
पहले उन्होंने मुझे देखा फिर मैंने उन्हें देखा,
पहले मैंने स्माइल पास की, फिर उन्होंने नहीं की,
पहले उन्होंने आई-डी मांगी, फिर मुझे तो दिखानी ही थी,
उन्होंने हम्म बोला, फिर मैं कुछ न बोला,
“वहां तो बर्फ गिर रही होगी?, नई”?,
हाँ, क्या?, माफ़ करना क्या कहा आपने ?,
ओह हाँ, ठीक कहा आपने “वहां बर्फ गिर रही है”, बहुत बर्फ गिर रही है ।
बर्फ तो है ही क्या चीज़ वहां तो बर्फीली सिल्लियाँ गिर रही हैं ।
अब तक पसीना कमर पर जा पहुंचा था वाया गर्दन लेकिन उनके सवाल के बाद जैसे मैं उनका दोस्त बन दया । हेल्दी हैण्ड-शैक के बाद मैंने 29 साल की उम्र में पहली बार एअरपोर्ट में कदम रखा । सामने दिखता सारा नज़ारा इस ओर इशारा कर रहा था कि "जितना टी.वी में देखा था ये जगह उस से कहीं ज्यादा रहस्यमय और विशाल है । जितनी अफरा-तफरी मेरे मन में मची हुई थी उतनी ही धरती के इस हिस्से पर । "कोई फ़ोन पर टंगा हुआ है, तो कोई टेलीविजन पर, ATM मशीनें लगातार रुपये फेंक रही है, लगातार अनाउंसमेंट हो रही है, फर्श कुछ ज्यादा ही चिकना है मेरी ही तरह कुछ और लोग भी फर्श को चूमते-चूमते बचते हैं, अनगिनत धौली लाइट अपना काम पूरी ईमानदारी से कर रही हैं", गर्दन पे ठहरी पसीने की बूंद ने वापस ला खड़ा किया एअरपोर्ट की फर्श पर ।
कहां से शुरू करूं कुछ समझ ही नहीं आ रहा था?, जवाब सोचते-सोचते ATM की लाइन में लगकर 11000 रु. निकाल लेता हूँ । एयरइंडिया के काउंटर पर ज्यादा भीड़ नहीं थी, 5 यात्रियों के बाद मेरा नंबर आ गया । काउंटर के पीछे बैठी महिला को टिकट का इन्वोइज़ दिखाकर मैंने खिड़की वाली सीट मांगी। शायद उसने सुना नहीं इसीलिए उसने इन्वोइस देखकर मेरे रकसैक को लगेज कन्वेयर बेल्ट पर रखने को बोला, मैंने भी आदर्श बच्चा बनकर रकसैक तुरंत बेल्ट पार रख दिया, इस उम्मीद में कि ऐसा करके शायद खिड़की मिल जाएगी । पता नहीं क्या बात थी मेरा बालों से भरा चेहरा शायद उसे पसंद नहीं आया इसीलिए उसने बड़ी शिष्टता से बोला "मांफी चाहती हूँ सर खिड़की वाली सीट कोई भी उपलब्ध नहीं है" । उसकी ये लाइन सुनते ही मैं समझ गया कि मुझे क्या करना है और तुरंत ही मैंने रोनी सूरत बनाकर उसकी तरफ देखा । पता नहीं उसे क्या समझ आया उसने एक बार और माफ़ी मांगते हुए बोर्डिंग पास मेरे हाथ में थमा दिया, इसका मतलब अब मुझे यहाँ से जाना होगा क्योंकि पीछे वाली लद्दाखी महिला 2 बड़े-बड़े बैगों के साथ मुझे घूर रही थी । हैण्ड बैग को साइड में रखा और बोर्डिंग पास को गोद में लेकर चुपचाप बैठ गया और सोचने लगा कि "रोनी सूरत नहीं बनानी चाहिए थी क्या पता खिड़की वाली सीट मिल ही जाती"।
रकसैक का वजन 9.1 किग्रा. तुला, एयर इंडिया की फ्लाइट में वेट-लिमिट 25 किग्रा. है । सुबह के 4:20 मिनट पर सारी औपचारिकताओं से फ्री हुआ । 2 बार चैकिन हुआ, दूसरे वाले में तो बेल्ट, जूते, जैकेट तक उतरवा डाले, मैंने भी सभी नियमों का ठीक तरह से पालन करते हुए सुरक्षाकर्मियों का भरपूर साथ दिया, मेरे लिए तो ये सब किसी एडवेंचर से कम न था ।
फ्लाइट का टाइम 5:55 मिनट था तब तक एअरपोर्ट को निहारने के अलावा कोई और चोइस नहीं थी । वेटिंग-हॉल में 40-45 मिनट इंतजार करने के बाद एक अनाउंसमेंट हुई जिसके तहत एयर इंडिया की फ्लाइट से जाने वाले सभी यात्री गेट नंबर 36 पर आ जाएँ । गेट नंबर 36 के सामने पहले से ही 30-35 लोग बैठे थे जिनमें से कुछ नींद की शरारतों के शिकार हो रहे थे ।
आखिरकार 5:55 हो गया लेकिन फ्लाइट अभी भी नहीं आई। एक और नई-नवेली अनाउंसमेंट हुई "एयर इंडिया की फ्लाइट से लेह जाने वाले यात्रियों को सूचित किया जाता है कि घने कोहरे की वजह से फ्लाइट में थोड़ी देरी हो सकती है, असुविधा के लिए खेद है", टिंग-टोंग और फिर से सारंगी बजने लगी ।
इंतजार, थोड़ा और इंतजार, बस छोटू सा इंतजार और.....और फाइनल अनाउंसमेंट हो गयी सभी ने तुरंत अपने बोर्डिंग पास हाथ में थाम लिए और गेट नंबर 36 में प्रवेश करने लगे । रास्ते में 2 महिला एयर होस्टेज ने हाथ जोड़कर सभी को नमस्कार किया, मैंने भी हैंडबैग को नीचे रखकर शिष्टाचार निभाया । दोनों ही खुश नहीं लग रही थी शायद मेरी ही तरह उन्हें भी इतनी सुबह उठना पसंद नहीं है । कुछ कदम चले ही थे कि अचानक से मैं हवाई जहाज में दाखिल हो गया । मुझे बड़ी हैरानी हुई ये सोचकर कि क्या सिस्टम बनाया है पता ही नहीं चला कि कब जहाज में पहुँच गये ।
अंदर एक लड़का मिला एयर इंडिया की ड्रेस में जिसने मेरा बोर्डिंग पास देखकर मुझे इशारा किया कि "सर आपकी सीट 'A1445-F8' खिड़की वाली है" । जैसे ही मैं उस तरह जाने लगा तभी मैंने सोचा, क्या खिड़की वाली?, और एक बार फिर से उससे कन्फर्म किया फिर से वही जवाब पाकर मेरे दिल के बुग्यालों में बर्फ गिरने लगी । मैं खुश था और ख़ुशी की लाइन मेरे होंटों से होती हुई मेरे कानों तक पहुँच गयी क्योंकि रोनी सूरत काम कर गयी थी ।
एक और अनाउंसमेंट हुई जिसके बाद 2 महिला एयरहोस्टेज आई जिन्होंने सभी को सीट बेल्ट कैसे बांधनी है, आपातकालीन द्वार कौनसा है और कहाँ से नीचे कूदना है आदि का ज्ञान पेला । प्लेन के भीतर बहुत सारी सीट्स थीं, गिनी तो नहीं लेकिन बहुत सारी थी और ज्यादातर खाली थीं । अब मैं कंफ्यूज हो गया क्योंकि जब मैंने ऑनलाइन बुकिंग की थी तब तो इस प्लेन में सिर्फ 5 सीट ही ऐवेलेबल दिखा रहा था और यहाँ देख रहा हूँ तो नज़ारा ही अलग है ।
अनाउंसमेंट के बाद सभी ने अपनी-अपनी सीट पेटी बाँध ली । करेक्ट 6:30 पर जहाज हवा में पहुँच गया और कुछ ही देर में उसने अपने पंजे भी ऊपर खींच लिए । कहाँ तो मैं सोच-सोचकर कितना एक्साइट हो रहा था कि पक्का कुछ तो अलग फील होगा, लेकिन प्लेन के टेकऑफ करने के बाद कुछ भी महसूस नहीं हुआ । ऊपर से जब ऊपर पहुंचा तब तो पूछों ही मत क्या हाल था । भला इतना स्लो भी कोई जहाज उड़ता है । अगर इस वक़्त कोई इसके साथ पैदल भी चले तब भी इस से आगे निकल जाये ।
अब तक अँधेरा था इसलिए बाहर कुछ भी दिखाई नहीं दिया लेकिन लगभग 15-20 मिनट के बाद सूरज ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई । शायद सोने से भी सुनहरी सूरज की रौशनी है और उसकी गर्मी है । मेरी सीट प्लेन में लेफ्ट साइड में है जहां से सनराइज बिल्कुल भी नहीं दिखाई दे रहा है । वैसे ये बदली हुई सीट है क्योंकि ओफिसियल सीट तो राईट साइड वाले विंग के एकदम नीचे थी जहां से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था । बेशक सीटों की अदला-बदली मैं अकेला ही नहीं कर रहा था बाकी का मौहल्ला भी इसी काम में पूरी शिद्दत से जुटा हुआ था ।
आसमान में पहुंचते ही थोड़ा हिचकिचाते हुई एक-दो फोटो खींची क्योंकि एयरहोस्टेज मुझे ही देख रही थी लेकिन बाद में जब मैंने अपनी गर्दन 180 डिग्री पार घुमाई तब पता चला कि सभी पंच खिडकियों पर बैठकर ही पंचायत कर रहे हैं । बेफिक्र होकर काफी फोटो खींचे । एयरहोस्टेज गणित की टीचर की तरह बार-बार आती और सभी पंचों को डांट लगाकर चली जाती ।
45 मिनट के बाद सभी को नाश्ता सर्व किया गया, जिसकी प्लेट में पानी की बोतल, फ्रूट कटलेट, बन्न, 2 पराठे, बटर, जैम, दूध और चीनी थी । प्लेट को देखकर ऐसा लगा जैसे बोल रही हो कि "घबराओं मत खिड़की से नजारों को देखकर मन भरो मैं पेट भर दूंगी" । नीचे से गुजरते नजारों को देखकर मुझे कोई आईडिया नहीं लग रहा था कि कहाँ से गुजर रहे हैं?, जैसे-जैसे प्लेन आगे बढ़ता जाता वैसे-वैसे हरियाली से बाद बर्फ का साम्राज्य क्लियर होने लगा । सच बताऊँ इस नज़रें को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे गूगल मैप के सामने बैठा होऊं।
8 बजे हुई अनाउंसमेंट के बाद सभी ने एक बार फिर से खुद को सीट बेल्ट के हवाले कर दिया जिसके बाद फ्लाइट ने 8:10 पर लेह की धरती को छुआ । एक-एक करके पूरा प्लेन जल्द ही खाली हो गया । सभी यात्रियों को कुछ देर अपने-अपने लगेज बैगों के लिए इंतजार करना पड़ा । फ्लाइट में बताया गया कि बाहर का तापमान -15 डिग्री है, शायद अपनी ज़िन्दगी में पहली बार इतने तापमान में सांस लेने वाला था । बाहर धूप निकली हुई थी और सर्दी अपने शबाब पर थी ।
-15 के लिए मैं पूरी तरह तैयार था । सिर पर गर्म टोपी, 3 लेयर ऊपर, 2 लेयर नीचे, पैरों में गर्म मोटी जुराबें और हाथों में गर्म दस्ताने मुझे काफी गर्माहट का एहसास दे रहे थे । लेकिन जैसे ही सभी रनवे से एअरपोर्ट की तरफ बढ़े एक तेज ठंडी हवा का झोंका आया और पूरे शरीर को -15 से पूरी तरह परिचित करा गया । #वेलकम_टू_लेह
लेह में मेरा सिर्फ एक ही परिचित है जिनका नाम तेनजिंग है । ये मुझे त्रिलोकीनाथ मंदिर में मिले थे जब मैं चंबा से ट्रैकिंग करते हुए लाहौल पहुंचा था, उसी समय इन्होंने मुझे चादर ट्रैक के लिए इनवाईट किया था । दिल्ली से निकलते ही तेनजिंग को इन्फॉर्म कर दिया था । यहाँ आते ही फ़ोन ने काम करना बंद कर दिया लेकिन तेनजिन सही समय पर एअरपोर्ट पहुंच गया ।
दोनों पूरी गर्मजोशी से मिले, उनका चेहरा पूरी तरह जला हुआ था, जहरीली ठण्ड की वजह से । कुछ ही पलों में दोनों उनकी इनोवा में बैठ गये । जहां बैठकर उन्होंने वो सवाल किया जिसका जवाब मुझे नहीं मालूम था । “तो किस होटल में ठहरे हो?”, मेरे सारे जवाब "ना" में पाकर उन्होंने मुझे अपने घर रुकने का ऑफर दे डाला । 500-600 रु. के होटल को तो मैं बर्दाश्त कर पाता लेकिन 1500 वाले होटल को नहीं इसलिए तेनजिन जी के इस ऑफर को चाहते हुए भी मना नहीं कर पाया ।
एअरपोर्ट से उनके घर की दूरी सिर्फ 1 किमी. ही थी जहां हम कुछ ही मिनटों में पहुंच गये । घर पर अभी कोई भी नहीं था । ये लोग भी किराये पर रहते हैं यहाँ इनके घर में इनकी वाइफ और दो बच्चे हैं जिनमे से लड़की अभी कुछ दिनों के लिए अपनी नानी के घर गयी हुई हैं और लड़का यहीं रहता है, नाम रिज्विक है ।
हम रूम पर बैठे चाय पी रहे हैं, पहली बार लेह की नमकीन चाय पी वो भी लिटरों के हिसाब से । कुछ घंटे रूम पर बिताकर हम उनकी गाड़ी से चल पड़े चादर ट्रैक की खरीदारी करने । सबसे पहले हम आर्मी वाला स्लीपिंग बैग किराये पर उठाते हैं जिसके लिए 7 दिन का किराया 1400 रूपये देना पड़ा । ये डाउन स्लीपिंग बैग है आउटर प्लस इनर के साथ, वजन होगा करीबन 3.5 किग्रा. । यहाँ से उस लड़के के पास पहुंचे जो मेरे साथ ट्रैक पर जायेगा, नाम है सोनम गोन्बो जोकि लिंगशेड गाँव का रहने वाला है और आजकल लेह में ही रहता है ।
किराना शॉप से 8 दिन का राशन लेने में 4885 रूपये का खर्चा हो जाता है, टोटल देखकर मेरे तोते जम जाते जाते हैं । अतिरिक्त 500 रूपये में हमने प्याज और कुछ हरी सब्जियां खरीदते हैं । तेनजिंग ‘जन्स्कर ट्रैक’ कम्पनी के लिए काम करता है जिसका सीधा फायदा मुझे मिलता है, कंपनी के स्टोर से हम मैट्रेस, टेंट, स्टोव, कप, चम्मच, कटोरी और एक पतीली गाड़ी में रख लेते हैं । 220 का 5 लीटर मिटटी का तेल, 380 के एक जोड़ी गमबूट भी कब्जे में आ जाते हैं जबकि उलटे पांव के लिए एक बूट बहुत टाइट हैं जिसपर दूकान वाले का कहना है कि “ये एक-दो दिन में खुल जायेंगे” । सारा सामान लेकर हम तेनजिंग के रूम पर पहुंच जाते हैं ।
रात का वक्त है, रूम में 2 छोटे हीटर चल रहे हैं । डिनर के बाद सभी साढ़े नौ तक बैड पर हैं और थोड़ी देर बात करने के बाद सो जाते हैं । वैसे आज ही मैं आर्मी वाले स्लीपिंग बैग को आजमा रहा हूँ उसी में सोकर । क्या दिन रहा, पहली हवाई यात्रा वो भी जनवरी में लदाख जैसी जगह में ऊपर से पहली बार माइनस पन्द्रह डिग्री में। पहला दिन खत्म हो गया, आज का कुल खर्चा 7365 रूपये रहा । बहुत खर्चा हो गया काश अरुण जसरोटिया भी साथ होता तो ये खर्चा सीधे ही आधा हो जाता । “उम्मीद करता हूँ आगे खर्चा कम होगा” सोचकर सो जाता हूँ ।
10 अक्टूबर 2014 को आई.आई.टी. दिल्ली के इंटरनेट का फ्री इस्तेमाल करते हुए हम तीनों ने चादर ट्रैक की रिटर्न हवाई टिकट बुक करी । 3 महीने पहले टिकट बुक करने पर प्रति-व्यक्ति दिल्ली से लेह का वापसी हवाई टिकट 5500 रु. में मिल गया । पेमेंट मेरे कार्ड से हुई, 16500 रु. एकसाथ जाने पर मोबाइल के साथ-साथ दिल भी गर्म होने लगा । #सर्द_गर्म_दिल
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लेह |
हम चार लोगों ने प्लान बनाया पूरे चादर ट्रैक को चिलिंग से पदुम तक अकेले चलने का । इसके तहत हमने आई.आई.टी. दिल्ली के कैंटीन में लगातार कई दिन झक्क मारी, जिसमें यह तय हुआ कि “हम चारों बिना किसी गाइड और पार्टर के जाऐंगे। सारा राशन लेह से ही खरीद लेंगे और अगर सामान भारी हो गया तो स्लैज खरीद लेंगे"। ये सब बोलते हुए धनुष एकदम मोटिवेशनल स्पीकर से कम नहीं लग रहा था, सबकुछ ठीक था लेकिन ये स्लैज बीच में कहां से आ गई? । लगता है इंजीनियर जोश-जोश में बोल गया ।
हम चार में पहला मैं (कन्फ्यूज कॉमन मैन), दूसरा दिल्ली आई.आई.टी का इंजीनियर (धनुष के. देव), तीसरा भी दिल्ली आई.आई.टी का इंजीनियर (सनोज वादियोदन), और चौथा इन दोनों का दोस्त नवीन । धीरे धीरे तैयारियाँ जोर पकड़ने लगी और अगले ही महीने 2 में से एक इंजीनियर ने जाने के मना कर दिया, हौसले टूटे नहीं क्योंकि तीन भी इस ट्रैक के लिए काफी हैं । वक्त आगे बढ़ता गया और 9 जनवरी 2015 आ गयी जिस दिन हमें निकलना था । बुरी खबर ने स्वागत किया एक और इंजीनियर ने जाने से मना कर दिया और चौथे साथी ने लेह की बजाय श्रीनगर जाना बेहतर समझा, अब तक अपना इंजीनियर कौम से विश्वास उठ चुका था ।
मन में चादर टूट चुकी थी क्योंकि अकेले मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि -20...25 डिग्री का सामना कर सकूँ । तो तय हो गया कि इस साल हममें से कोई भी चादर पर नहीं जा रहा है । बेशक प्लान कैंसिल हो गया लेकिन इस वजह से चादर के लिए मेरी सारी चैक लिस्ट पूरी हो गयी जो शायद किसी और साल काम आ सके ।
2014 जाते-जाते उम्मीदों को तोड़ गया और चादर को भी। न जाने क्या हुआ कि चादर ट्रैक बंद हो गया इस साल के लिए । दिल को समझाने के लिए ये अच्छा बहाना था कि "अच्छा हुआ जो मैं नहीं गया वर्ना अपन भी चादर में लैंड कर जाते"। 2015 में तब तक चादर का नशा चढ़ा रहा जब तक मैंने इसकी टिकट फिर से बुक नहीं कर दी । 15 नवम्बर 2015 वो दिन था जब फिर से उम्मीदों का मेढ़क दिल के नालों में उछलने लगा । बेशक इस बार मैं अकेले जाना चाहता था लेकिन डर भी तो कोई चीज़ होती है, तो एक साथी इस बार भी तैयार हो गया "अरुण जसरोटिया"।
इस बार का प्रति-व्यक्ति रिटर्न टिकट 6000 में बुक हुआ और तारीख तय हुई 25 जनवरी 2016 । दोनों ने मिलकर हर कोण पर बात की और चैक लिस्ट पर जमकर काम शुरू किया । अरुण ने खरीदारी शुरू कर दी -25 डिग्री के लिए जबकि मेरी शॉपिंग पिछले साल ही पूरी हो गयी थी, इस बार तो बस हर सामान को रकसैक में ठूंसना बाकी रह गया।
तैयारियों के हिसाब से हमने कुछ पॉइंट्स तय किये जैसे:
1. स्लीपिंग बैग लेह से रेंट पर लेंगे
2. - तापमान के लिए फॉर्म वाला मोटा मैट्रेस (Mattress) लेह से रेंट पर लेंगे
3. एक 2 मैन टेंट भी वहीँ से रेंट पर लेंगे
4. और लेह में रूम का बंदोबस्त अरुण करवा देगा, कोई उसके जानने वाले हैं लेह में जो आर्मी में हैं ।
उपरोक्त के अलावा बाकी सारा छोटा-मोटा सामान खाट पर इकठ्ठा करके 45 लीटर के रकसैक में भर लिया । अरुण जम्मू से ट्रेन लेकर दिल्ली आयेगा और हम दोनों एकसाथ मेरे घर से लेह के लिए निकलेंगे । थोड़ी समस्या थी फ्लाइट में लगेज के वजन को लेकर इसलिए तरीका ये निकाला कि 3-3 जोड़ी पहले ही पहनकर जायेंगे जिससे बैग हल्का हो जायेगा ।
23 जनवरी एक बार फिर दोनों ने फ़ोन पर बात करी और चैक लिस्ट को क्रॉस चेक किया । 24 जनवरी की रात अरुण ट्रेन में था और जैसे ही पठानकोट क्रॉस किया तभी दर्दनाक पथरी के दर्द के उसे घेर लिया। दर्द इतना ज्यादा था कि उसने जैसे-तैसे खुद को स्टेशन पर उतारा और घर पर कॉल करके अपने परिवार को अपनी मौजूदा हालत की खबर दी।
रात में अरुण मुझे सिर्फ एस.एम.एस (SMS) ही कर पाया जिसमें उसने लिखा "बाबा जी सॉरी मैं नहीं आ पाउँगा, स्टोन के दर्द की वजह से मुझे वापस घर जाना पड़ गया"। ये एस.एम.एस मुझे देर रात मिला और सच बताऊँ इस बार मुझे ज़रा भी बुरा नहीं लगा क्योंकि पिछली बार की तुलना में इस बार मैं ज्यादा तैयार था किसी ही हालात के लिए । अरुण को "टेक केयर" का रिप्लाई किया और सुबह 3:30 की कैब बुक करके सो गया ।
सुबह 2:30 उठकर मुंह-हाथ धोकर तैयार हुआ ही था कि कैब आ गयी । 25 जनवरी सुबह 3:30 बजे चादर पर चलने का सपना आँखों में सजा कर चल पड़ा इंदिरा गाँधी एअरपोर्ट टी-3 की ओर । कैब ने एअरपोर्ट 3:58 पर उतारा ।
एक प्रॉब्लम और थी जो काफी समय से मुझे दीमग की तरह खाए जा रही थी और वो थी मेरी बढ़ी हुई दाढ़ी-मूंछ । यह मेरा पहला हवाई सफ़र होने वाला है इसलिए मुझे जरा भी ज्ञान नहीं है कि किस प्रकार के हुलिये वाले इन्सान को एअरपोर्ट में घुसने देते हैं । “वापस तो नहीं भेजेंगे, अगर भेज दिया तो?”, दाढ़ी नौचते हुए मैं एअरपोर्ट के गेट की तरफ बढ़ा । यह समस्या इसलिए थी क्योंकि मेरी पर्सनल आई.डी पर चेहरा एकदम छिले हुए अंडे जैसा है । बार-बार डर लग रहा था कि अगर आई.डी से चेहरा मैच नहीं हुआ तो क्या होगा ? ।
गेट पर खड़े खाकी वर्दी में पुलिस वाले को देखते ही मुझे 5500 रु. के जाने का डर दिखाई देने लगा, इसी डर की वजह से बिना कुछ सोचे-समझे मैंने तुरंत अपना ब्लैक-एंड-वाइट वोटर आई-डी कार्ड निकालकर पसीने से भीगते दाहिने हाथ में ले लिया । जहां एक तरफ डर से दिल कांप रहा था वहीँ ठण्ड में कांपती मेरी एक जोड़ी पर्सनल टाँगे साथ छोड़ रही थी । 5 कदम सरकते ही जिस तेजी से पुलिस वाले ने मुझे देखा उतनी ही तेजी से मैंने गर्म मोटे पायजामे की बाईं जेब से दिल्ली से लेह का बुकिंग प्रिंटआउट निकाल लिया, इस उम्मीद में कि पुलिस वाला इसे देखेगा और ख़ुशी-ख़ुशी मुझे एअरपोर्ट में जाने देगा ।
4:05 पर हम दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने हुए,
पहले उन्होंने मुझे देखा फिर मैंने उन्हें देखा,
पहले मैंने स्माइल पास की, फिर उन्होंने नहीं की,
पहले उन्होंने आई-डी मांगी, फिर मुझे तो दिखानी ही थी,
उन्होंने हम्म बोला, फिर मैं कुछ न बोला,
“वहां तो बर्फ गिर रही होगी?, नई”?,
हाँ, क्या?, माफ़ करना क्या कहा आपने ?,
ओह हाँ, ठीक कहा आपने “वहां बर्फ गिर रही है”, बहुत बर्फ गिर रही है ।
बर्फ तो है ही क्या चीज़ वहां तो बर्फीली सिल्लियाँ गिर रही हैं ।
अब तक पसीना कमर पर जा पहुंचा था वाया गर्दन लेकिन उनके सवाल के बाद जैसे मैं उनका दोस्त बन दया । हेल्दी हैण्ड-शैक के बाद मैंने 29 साल की उम्र में पहली बार एअरपोर्ट में कदम रखा । सामने दिखता सारा नज़ारा इस ओर इशारा कर रहा था कि "जितना टी.वी में देखा था ये जगह उस से कहीं ज्यादा रहस्यमय और विशाल है । जितनी अफरा-तफरी मेरे मन में मची हुई थी उतनी ही धरती के इस हिस्से पर । "कोई फ़ोन पर टंगा हुआ है, तो कोई टेलीविजन पर, ATM मशीनें लगातार रुपये फेंक रही है, लगातार अनाउंसमेंट हो रही है, फर्श कुछ ज्यादा ही चिकना है मेरी ही तरह कुछ और लोग भी फर्श को चूमते-चूमते बचते हैं, अनगिनत धौली लाइट अपना काम पूरी ईमानदारी से कर रही हैं", गर्दन पे ठहरी पसीने की बूंद ने वापस ला खड़ा किया एअरपोर्ट की फर्श पर ।
कहां से शुरू करूं कुछ समझ ही नहीं आ रहा था?, जवाब सोचते-सोचते ATM की लाइन में लगकर 11000 रु. निकाल लेता हूँ । एयरइंडिया के काउंटर पर ज्यादा भीड़ नहीं थी, 5 यात्रियों के बाद मेरा नंबर आ गया । काउंटर के पीछे बैठी महिला को टिकट का इन्वोइज़ दिखाकर मैंने खिड़की वाली सीट मांगी। शायद उसने सुना नहीं इसीलिए उसने इन्वोइस देखकर मेरे रकसैक को लगेज कन्वेयर बेल्ट पर रखने को बोला, मैंने भी आदर्श बच्चा बनकर रकसैक तुरंत बेल्ट पार रख दिया, इस उम्मीद में कि ऐसा करके शायद खिड़की मिल जाएगी । पता नहीं क्या बात थी मेरा बालों से भरा चेहरा शायद उसे पसंद नहीं आया इसीलिए उसने बड़ी शिष्टता से बोला "मांफी चाहती हूँ सर खिड़की वाली सीट कोई भी उपलब्ध नहीं है" । उसकी ये लाइन सुनते ही मैं समझ गया कि मुझे क्या करना है और तुरंत ही मैंने रोनी सूरत बनाकर उसकी तरफ देखा । पता नहीं उसे क्या समझ आया उसने एक बार और माफ़ी मांगते हुए बोर्डिंग पास मेरे हाथ में थमा दिया, इसका मतलब अब मुझे यहाँ से जाना होगा क्योंकि पीछे वाली लद्दाखी महिला 2 बड़े-बड़े बैगों के साथ मुझे घूर रही थी । हैण्ड बैग को साइड में रखा और बोर्डिंग पास को गोद में लेकर चुपचाप बैठ गया और सोचने लगा कि "रोनी सूरत नहीं बनानी चाहिए थी क्या पता खिड़की वाली सीट मिल ही जाती"।
रकसैक का वजन 9.1 किग्रा. तुला, एयर इंडिया की फ्लाइट में वेट-लिमिट 25 किग्रा. है । सुबह के 4:20 मिनट पर सारी औपचारिकताओं से फ्री हुआ । 2 बार चैकिन हुआ, दूसरे वाले में तो बेल्ट, जूते, जैकेट तक उतरवा डाले, मैंने भी सभी नियमों का ठीक तरह से पालन करते हुए सुरक्षाकर्मियों का भरपूर साथ दिया, मेरे लिए तो ये सब किसी एडवेंचर से कम न था ।
फ्लाइट का टाइम 5:55 मिनट था तब तक एअरपोर्ट को निहारने के अलावा कोई और चोइस नहीं थी । वेटिंग-हॉल में 40-45 मिनट इंतजार करने के बाद एक अनाउंसमेंट हुई जिसके तहत एयर इंडिया की फ्लाइट से जाने वाले सभी यात्री गेट नंबर 36 पर आ जाएँ । गेट नंबर 36 के सामने पहले से ही 30-35 लोग बैठे थे जिनमें से कुछ नींद की शरारतों के शिकार हो रहे थे ।
आखिरकार 5:55 हो गया लेकिन फ्लाइट अभी भी नहीं आई। एक और नई-नवेली अनाउंसमेंट हुई "एयर इंडिया की फ्लाइट से लेह जाने वाले यात्रियों को सूचित किया जाता है कि घने कोहरे की वजह से फ्लाइट में थोड़ी देरी हो सकती है, असुविधा के लिए खेद है", टिंग-टोंग और फिर से सारंगी बजने लगी ।
इंतजार, थोड़ा और इंतजार, बस छोटू सा इंतजार और.....और फाइनल अनाउंसमेंट हो गयी सभी ने तुरंत अपने बोर्डिंग पास हाथ में थाम लिए और गेट नंबर 36 में प्रवेश करने लगे । रास्ते में 2 महिला एयर होस्टेज ने हाथ जोड़कर सभी को नमस्कार किया, मैंने भी हैंडबैग को नीचे रखकर शिष्टाचार निभाया । दोनों ही खुश नहीं लग रही थी शायद मेरी ही तरह उन्हें भी इतनी सुबह उठना पसंद नहीं है । कुछ कदम चले ही थे कि अचानक से मैं हवाई जहाज में दाखिल हो गया । मुझे बड़ी हैरानी हुई ये सोचकर कि क्या सिस्टम बनाया है पता ही नहीं चला कि कब जहाज में पहुँच गये ।
अंदर एक लड़का मिला एयर इंडिया की ड्रेस में जिसने मेरा बोर्डिंग पास देखकर मुझे इशारा किया कि "सर आपकी सीट 'A1445-F8' खिड़की वाली है" । जैसे ही मैं उस तरह जाने लगा तभी मैंने सोचा, क्या खिड़की वाली?, और एक बार फिर से उससे कन्फर्म किया फिर से वही जवाब पाकर मेरे दिल के बुग्यालों में बर्फ गिरने लगी । मैं खुश था और ख़ुशी की लाइन मेरे होंटों से होती हुई मेरे कानों तक पहुँच गयी क्योंकि रोनी सूरत काम कर गयी थी ।
एक और अनाउंसमेंट हुई जिसके बाद 2 महिला एयरहोस्टेज आई जिन्होंने सभी को सीट बेल्ट कैसे बांधनी है, आपातकालीन द्वार कौनसा है और कहाँ से नीचे कूदना है आदि का ज्ञान पेला । प्लेन के भीतर बहुत सारी सीट्स थीं, गिनी तो नहीं लेकिन बहुत सारी थी और ज्यादातर खाली थीं । अब मैं कंफ्यूज हो गया क्योंकि जब मैंने ऑनलाइन बुकिंग की थी तब तो इस प्लेन में सिर्फ 5 सीट ही ऐवेलेबल दिखा रहा था और यहाँ देख रहा हूँ तो नज़ारा ही अलग है ।
अनाउंसमेंट के बाद सभी ने अपनी-अपनी सीट पेटी बाँध ली । करेक्ट 6:30 पर जहाज हवा में पहुँच गया और कुछ ही देर में उसने अपने पंजे भी ऊपर खींच लिए । कहाँ तो मैं सोच-सोचकर कितना एक्साइट हो रहा था कि पक्का कुछ तो अलग फील होगा, लेकिन प्लेन के टेकऑफ करने के बाद कुछ भी महसूस नहीं हुआ । ऊपर से जब ऊपर पहुंचा तब तो पूछों ही मत क्या हाल था । भला इतना स्लो भी कोई जहाज उड़ता है । अगर इस वक़्त कोई इसके साथ पैदल भी चले तब भी इस से आगे निकल जाये ।
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इंदिरा गाँधी एअरपोर्ट, दिल्ली |
अब तक अँधेरा था इसलिए बाहर कुछ भी दिखाई नहीं दिया लेकिन लगभग 15-20 मिनट के बाद सूरज ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई । शायद सोने से भी सुनहरी सूरज की रौशनी है और उसकी गर्मी है । मेरी सीट प्लेन में लेफ्ट साइड में है जहां से सनराइज बिल्कुल भी नहीं दिखाई दे रहा है । वैसे ये बदली हुई सीट है क्योंकि ओफिसियल सीट तो राईट साइड वाले विंग के एकदम नीचे थी जहां से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था । बेशक सीटों की अदला-बदली मैं अकेला ही नहीं कर रहा था बाकी का मौहल्ला भी इसी काम में पूरी शिद्दत से जुटा हुआ था ।
आसमान में पहुंचते ही थोड़ा हिचकिचाते हुई एक-दो फोटो खींची क्योंकि एयरहोस्टेज मुझे ही देख रही थी लेकिन बाद में जब मैंने अपनी गर्दन 180 डिग्री पार घुमाई तब पता चला कि सभी पंच खिडकियों पर बैठकर ही पंचायत कर रहे हैं । बेफिक्र होकर काफी फोटो खींचे । एयरहोस्टेज गणित की टीचर की तरह बार-बार आती और सभी पंचों को डांट लगाकर चली जाती ।
45 मिनट के बाद सभी को नाश्ता सर्व किया गया, जिसकी प्लेट में पानी की बोतल, फ्रूट कटलेट, बन्न, 2 पराठे, बटर, जैम, दूध और चीनी थी । प्लेट को देखकर ऐसा लगा जैसे बोल रही हो कि "घबराओं मत खिड़की से नजारों को देखकर मन भरो मैं पेट भर दूंगी" । नीचे से गुजरते नजारों को देखकर मुझे कोई आईडिया नहीं लग रहा था कि कहाँ से गुजर रहे हैं?, जैसे-जैसे प्लेन आगे बढ़ता जाता वैसे-वैसे हरियाली से बाद बर्फ का साम्राज्य क्लियर होने लगा । सच बताऊँ इस नज़रें को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे गूगल मैप के सामने बैठा होऊं।
8 बजे हुई अनाउंसमेंट के बाद सभी ने एक बार फिर से खुद को सीट बेल्ट के हवाले कर दिया जिसके बाद फ्लाइट ने 8:10 पर लेह की धरती को छुआ । एक-एक करके पूरा प्लेन जल्द ही खाली हो गया । सभी यात्रियों को कुछ देर अपने-अपने लगेज बैगों के लिए इंतजार करना पड़ा । फ्लाइट में बताया गया कि बाहर का तापमान -15 डिग्री है, शायद अपनी ज़िन्दगी में पहली बार इतने तापमान में सांस लेने वाला था । बाहर धूप निकली हुई थी और सर्दी अपने शबाब पर थी ।
-15 के लिए मैं पूरी तरह तैयार था । सिर पर गर्म टोपी, 3 लेयर ऊपर, 2 लेयर नीचे, पैरों में गर्म मोटी जुराबें और हाथों में गर्म दस्ताने मुझे काफी गर्माहट का एहसास दे रहे थे । लेकिन जैसे ही सभी रनवे से एअरपोर्ट की तरफ बढ़े एक तेज ठंडी हवा का झोंका आया और पूरे शरीर को -15 से पूरी तरह परिचित करा गया । #वेलकम_टू_लेह
लेह में मेरा सिर्फ एक ही परिचित है जिनका नाम तेनजिंग है । ये मुझे त्रिलोकीनाथ मंदिर में मिले थे जब मैं चंबा से ट्रैकिंग करते हुए लाहौल पहुंचा था, उसी समय इन्होंने मुझे चादर ट्रैक के लिए इनवाईट किया था । दिल्ली से निकलते ही तेनजिंग को इन्फॉर्म कर दिया था । यहाँ आते ही फ़ोन ने काम करना बंद कर दिया लेकिन तेनजिन सही समय पर एअरपोर्ट पहुंच गया ।
दोनों पूरी गर्मजोशी से मिले, उनका चेहरा पूरी तरह जला हुआ था, जहरीली ठण्ड की वजह से । कुछ ही पलों में दोनों उनकी इनोवा में बैठ गये । जहां बैठकर उन्होंने वो सवाल किया जिसका जवाब मुझे नहीं मालूम था । “तो किस होटल में ठहरे हो?”, मेरे सारे जवाब "ना" में पाकर उन्होंने मुझे अपने घर रुकने का ऑफर दे डाला । 500-600 रु. के होटल को तो मैं बर्दाश्त कर पाता लेकिन 1500 वाले होटल को नहीं इसलिए तेनजिन जी के इस ऑफर को चाहते हुए भी मना नहीं कर पाया ।
एअरपोर्ट से उनके घर की दूरी सिर्फ 1 किमी. ही थी जहां हम कुछ ही मिनटों में पहुंच गये । घर पर अभी कोई भी नहीं था । ये लोग भी किराये पर रहते हैं यहाँ इनके घर में इनकी वाइफ और दो बच्चे हैं जिनमे से लड़की अभी कुछ दिनों के लिए अपनी नानी के घर गयी हुई हैं और लड़का यहीं रहता है, नाम रिज्विक है ।
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इस जमी बाल्टी को देखकर मुझे लगा था कि मेरा खून भी जम जायेगा यहाँ |
किराना शॉप से 8 दिन का राशन लेने में 4885 रूपये का खर्चा हो जाता है, टोटल देखकर मेरे तोते जम जाते जाते हैं । अतिरिक्त 500 रूपये में हमने प्याज और कुछ हरी सब्जियां खरीदते हैं । तेनजिंग ‘जन्स्कर ट्रैक’ कम्पनी के लिए काम करता है जिसका सीधा फायदा मुझे मिलता है, कंपनी के स्टोर से हम मैट्रेस, टेंट, स्टोव, कप, चम्मच, कटोरी और एक पतीली गाड़ी में रख लेते हैं । 220 का 5 लीटर मिटटी का तेल, 380 के एक जोड़ी गमबूट भी कब्जे में आ जाते हैं जबकि उलटे पांव के लिए एक बूट बहुत टाइट हैं जिसपर दूकान वाले का कहना है कि “ये एक-दो दिन में खुल जायेंगे” । सारा सामान लेकर हम तेनजिंग के रूम पर पहुंच जाते हैं ।
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दो में से एक हीटर |
रात का वक्त है, रूम में 2 छोटे हीटर चल रहे हैं । डिनर के बाद सभी साढ़े नौ तक बैड पर हैं और थोड़ी देर बात करने के बाद सो जाते हैं । वैसे आज ही मैं आर्मी वाले स्लीपिंग बैग को आजमा रहा हूँ उसी में सोकर । क्या दिन रहा, पहली हवाई यात्रा वो भी जनवरी में लदाख जैसी जगह में ऊपर से पहली बार माइनस पन्द्रह डिग्री में। पहला दिन खत्म हो गया, आज का कुल खर्चा 7365 रूपये रहा । बहुत खर्चा हो गया काश अरुण जसरोटिया भी साथ होता तो ये खर्चा सीधे ही आधा हो जाता । “उम्मीद करता हूँ आगे खर्चा कम होगा” सोचकर सो जाता हूँ ।
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जहाज में रखे मैनुअल |
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एयर इंडिया में मिला नास्त्ता |
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दिखता है ना सस्ती वॉल्वो टाइप |
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एक रामदेव तो हममे भी है |
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ये सीट मिली थी सबसे पहले, जिसे जल्द ही चेंज कर दिया |
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लैंड करते हुए |
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लैंड करते हुए |
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शांत लेह |
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एअरपोर्ट रोड |
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तेनजिंग के घर की ओर |
वाह बाबाजी वाह । क्या खूब लिखा है।
ReplyDeleteधन्यवाद साब
DeleteBahut hi sunder......
ReplyDeleteधन्यवाद सर
Deleteबाबा जी अब इंजिनियरों पर भरोसा तो नहीं रहा
ReplyDeleteहम इंजीनियररों से 100 फीट की दूरी कायम रखते हैं अब
Deleteबहुत बडिया लिखा हमेशा की तरह बाबा रामदेव जी
ReplyDeleteसीख रहे हैं सर बस
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