Friday, June 9, 2017

पराशर झील - जब एडवेंचर सजा बन गया (फोटो स्टोरी, भाग -3), Prashar Lake - When the adventure becomes trouble (Photo Story, Part - 3)

2 मार्च 2015
ऑंखें खोलने से पहले कल के चुनौतीपूर्ण दिन को श्रधांजलि दी । बाहर किरणें निकल आई हैं और भीतर उम्मीदों का सूरज । उठते ही तीनों ने जो आपस में बांटी वो थी “सच्ची मुस्कान” । सूरज की किरणों पर फिसलती छोटी, भोली, प्यारी, बस एक “कट्टो मुस्कान” । सूरज की गर्मी, बर्फ की ठंडक, पहाड़ों की कतार, पेड़ों की रौनक, आज सबकुछ सजीव लग रहा है, आज सब ताजा हो गया है, आज हम जिंदा हो गये हैं ।

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हमारी रजाई गर्म थी और साइकिल की ठंडी ⓒ Rohit kalyana

सुबह 6 बजे ऑंखें खुली । रात को बर्फ़बारी पता नहीं कब बंद हुई । मेरे दोनों साथी उठते ही शौच से मुक्ति पाने को परेशान थे और मैं अपने जूतों को सूखा देखकर जिनको फिर से मौका मिलेगा बर्फ के गर्भ में गोते लगाने का, और ऐसा मैं कतई नहीं चाहता था ।

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चलो पराशर ⓒ Rohit kalyana

पेड़ ने गर्मजोशी से हाथ मिलाकर हमारा स्वागत किया और नाश्ते के बारे में पूछा । बहुत-बहुत धन्यवाद आपकी उदारता का । हम नाश्ता करेंगे परंतु पराशर झील के दर्शन के बाद जिसके लिए हमने इतनी मुसीबतों को झेला है । पराशर झील जहां से 1 किमी. दूर है जहां तक जाने के लिए पेड़ ने हम तीनों को गमबूट दे दिए । 8 बजे सुबह 7 से 8 इंच मोटी बर्फ की गहराई ने पराशर की ओर पहले कदम का स्वागत किया ।

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पेड़ का घर, फारेस्ट गेस्ट हाउस ⓒ Rohit kalyana

रोड़ पर पहुंचने में हमें 15 मिनट लग गये और यहाँ से दिखा हमें पीले रंग से रंगा वो देवघर जो कल हमारे लिए स्वर्ग सिद्ध हुआ । ये फारेस्ट गेस्ट हाउस है जिसके केयर-टेकर पेड़, आई मीन ‘रामसिंह जी’ हैं । साफ़ मौसम ने सच में इसे स्वर्ग बना दिया था ।

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कदमताल ताल की ओर ⓒ Rohit kalyana

200 मी. में कोई कितनी बार फिसल सकता है? जवाब है कम से कम 25 बार और वो भी तब जब पैरों में प्लास्टिक के गमबूट हो । गमबूट और बर्फ की मानो ठनी पड़ी थी । गमबूट बर्फ को अंदर नहीं आने देना चाहते थे और बर्फ थी कि बिना अंदर आये छोड़ने वाली नहीं थी । अचानक लगभग 2 फीट गहरा हिडन चोर गड्ढा आया और बर्फ विजयी हुई । फिर हुआ छप्प छप्प छप्प का खेल ।

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44 घंटों बाद पराशर झील के दर्शन ⓒ Rohit kalyana

दिल्ली से चलकर झील तक पहुंचने में हमें पूरे 44 घंटे लग गये । शायद ही किसी ने इतनी सिद्दत दिखाई होगी यहाँ तक पहुंचने में । सुबह के साढ़े आठ बजे हैं, सफ़ेद मखमली पश्मीना ने प्रकृति को अपने आगोश में ले रखा है । इस नजारे ने आँखों को तृप्त किया और वहां होने के एहसास ने मन को ।

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पराशर झील के किनारे बना ऋषि पराशर का मंदिर ⓒ Rohit kalyana

मैं यहाँ पहले भी आ चुका हूँ, वो अगस्त था, बादल छाये हुए थे हरे रंग के रंग-बिरंगें गलीचों ने इस जगह को अपनी पलकों पर सजाया हुआ था । तब मैं पैदल चलकर आया था और अब मैं पैडल चलाकर, तब यहाँ हरे रंग का राज था और अब सफ़ेद का । जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकारते हुए हमें तथाता का अनुभव हुआ । मंदिर अभी बंद था लेकिन यहाँ मंदिर के केयर-टेकर मौजूद थे और उनसे बात करके पता चला कि सर्दियों में चोरी के चलते मंदिर के किवाड़ अभी बंद है जब पंडित जी आएंगे तब हम दर्शन कर सकते हैं । मंदिर की मूर्ति के सामने जाने की जरुरत नहीं थी हमें वो मिल गया था जिसके चक्कर में एडवेंचर हमें यहाँ तक खींच लाया था । #हिमालयी_आशीर्वाद 

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आलू के पराठों का नाश्ता ⓒ Rohit kalyana

तीनों ने मिलकर 10 आलू के पराठे खाएँ । अब समय हो गया है वापस जाने का । पेड़ ने अपनी उदारता का उदाहरण देते हुए कुछ भी लेने से इनकार कर दिया क्योंकि उन्हें लग रहा था कि हम पैसे बागी ही छोड़ आये हैं लेकिन जब हमने उन्हें बताया कि बागी में सिर्फ सामान छोड़ा है पैसे नहीं तब उन्होंने 1000 रु. बोले, और सहर्ष हमने उन्हें पूरे एक हजार रु. अदा किये । पराठें स्वादिष्ट थे, पेट भर गया था और मन संतुष्ट । “फिर मिलेंगे”, बोलकर पेड़ को हम चल पड़े अपना वापसी का सफ़र शुरू करने ।

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हमारे इंतज़ार में बाइक और बर्फ ⓒ Rohit kalyana

कल शाम 6 बजे के बाद अब जाकर हमने अपनी साइकिलों की सुध ली । बेचारी रात भर बर्फ में भीगती रही, कहीं गुस्से में पंचर न हो जायें । हमने अपना वापसी का सफ़र 11 बजे शुरू किया, ये सोचकर कि “आज का सफ़र कल जितना मुश्किल नहीं होगा” ।

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वापसी में भी चुनौती कम नहीं थी ⓒ Rohit kalyana

जूतों को छप्प-छप्प करने में 2 मिनट का इंतजार भी नहीं करना पड़ा । न जाने कुदरत ने हमारे लिया क्या प्लान किया हुआ था? । 10 मिनट बाद ही काले घने बादलों ने सूरज का अपहरण कर लिया और बिजलियों को छोड़ दिया हमारी खैर लेने को । साइकिल के टायर से कल जो रेखा बनी थी आज उसने पानी से लबालब भरकर नाली का रूप ले लिया । हमने इसी ‘नाली-हाईवे’ का इस्तेमाल किया वापसी में ।

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टायर जब घूमना बंद कर दे ⓒ Rohit kalyana

हम तेजी से इस बर्फीले रेगिस्तान को पार करना चाह रहे थे लेकिन परेशानियों की वैधता थी कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी । साइकिल का टायर जैसे ही नाली से बाहर निकल जाता वैसे ही ताज़ा बर्फ उस पर लिपटकर उसे रोक देती । हजारों बार हमें साइकिल को उठाकर पटकना पड़ता तब कहीं जाकर बर्फ टायर का पीछा छोड़ती । तीन आवाजें मुझे लगातार आती रही पहली बर्फ से जाम होते टायरों की, दूसरी तेज चलती साँसों की और तीसरी नाक के सूप को बार-बार ऊपर खींचने की । इतने ठन्डे मौसम में नाक इस कदर बहने लग जाती है कि हमें खुद भी समझ नहीं आता कि ये बार-बार हमारी मर्जी के बिना निकल कैसे जाती है । #मनमौजी_नाक

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वापसी में दिखी एक और झील ⓒ Rohit kalyana

तेजी से चलने के चक्कर में मेरा पैर फिसल गया और मैंने खुद के साथ-साथ साइकिल को भी गिरा दिया, मुझे उठाने के लिए जैसे ही सनोज और धनुष पलते वैसे ही हम तीनों की नजर इस झील पर पड़ी । बिना कुछ बोले तीनों एक लाइन में इस नज़ारें को देखने लगे । तेज चलती साँसें इस मंजर को खुद में समां लेना चाहती थी, ऑंखें बड़ी हो गयी थी इस दृश्य को पीने के लिए । बुत बना दिया कुदरत ने, न जाने कितने परदे और उठने बाकी हैं इसके मंच पर । अचानक एक तेज हवा के शरारती झोंके ने सीधा मेरे मुंह पर टक्कर मारी और मेरे रोम-रोम को खड़ा कर दिया । शायद वो हमें एक खास सन्देश देना चाहता था कि “यहाँ पर्यटक बनकर नहीं प्रकृति बनकर खेलों” ।

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कहीं सफ़ेद सड़क पर ⓒ Rohit kalyana

हमने मिलकर सभी रास्तों को काला बनाया है और अपने मन को भी । जिन रास्तों पर चलकर हमें अपनी मंजिल मिलनी है उन रास्तों की तरफ कभी ध्यान ही नहीं दिया और लग गये बनावटी रास्ते बनाने में । अब ये तो कहना नाजायज न होगा कि बनावटी रास्ते सिर्फ बनावटी मंजिल की ओर ही ले जा सकते हैं । मेरे साथी मुझसे थोड़ा आगे चल रहे थे मैं उनसे थोड़ा पीछे और मेरा मन मुझसे भी बहुत पीछे ।

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बर्फीले साम्राज्य की सीमा समाप्त ⓒ Rohit kalyana

12:50 पर आख़िरकार हम बर्फ के दायरे से बाहर आये । ये अलग जगह है, यहाँ मौसम भी अलग है । जैसे हम नींद से जाग गये हो और सपने को याद कर रहे हो । अब मन वही पुराना खेल खेलेगा हमारी भावनाओं के साथ, वो यहाँ नहीं रहेगा भागेगा पीछे, वहीँ बर्फ के कारपेट पर, वहीं लेट मारेगा । भूल जायेगा कि नये रंग दिखने लगे हैं, हरा रंग चढ़ गया है धरती पर लेकिन नहीं... मन को तो सिर्फ अतीत से मतलब है वो वहीं रहेगा और वर्तमान को भुला देगा । अतीत का साथ अगर छोड़ भी देगा तो भविष्य की पुंछ पकड़ लेगा और चिपक जायेगा जौंक की तरह । फिर हर समय बोलता रहेगा “चलो फिर से चलते हैं ऐसी ही किसी जगह पर”, तोड़ेगा और तड़पायेगा । #मन_ही_मुक्ति_बेड़ी_भी

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इंसानों बच्चों की दुनिया में आपका स्वागत है ⓒ Rohit kalyana

साइकिल और पैडल ने बर्फ के खत्म होने का इंतज़ार पिछले 24 घंटों से किया है और जैसे ही बर्फ की सीमा से बाहर आये वैसे ही पैरों ने पैडल पर अपना कमाल दिखाना शुरू कर दिया । दोपहर 1:41 पर हमने पहली इंसानी बस्ती में कदम रखते ही सामना नन्हें क्रिकेटरों से हुआ जिन्होंने रोड़ को ही स्टेडियम बना रखा था । उनकी बाउंड्री का हमें कोई पता नहीं था लेकिन उनके चेहरे के भावों का हमें पूरा-पूरा एह्सास हो रहा था । #भोले_भाले_पौधे

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आखिरी एडवेंचर ⓒ Rohit kalyana

कीचड़ भरे रास्ते पर अगर साइकिल में मढ़गार्ड नहीं लगा हो तो आपका कीचड़मय होना तय है । स्थानीय लोगों ने दूर से ही हमें पहचान लिया और आग के सामने बैठे-बैठे चिल्लाने लगे “होए होय आ गये, कल कहां रह गये थे?” । हमने भी उनके सवालों को सुनकर लकड़ी के पुल को छोड़कर दूसरा रास्ता ले लिया आखिर अब तो टशन दिखाना बनता है । लाइन से तीनों ने साइकिल पर नदी को पार किया और सीधा चाय शॉप में जाकर सामान समेटना शुरू कर दिया । सामान समेत लिया, चाय पी ली, मैगी का लंच भी कर लिया अब वक़्त आ गया, वक़्त आ गया जाने का... नहीं-नहीं स्थानियों के साथ गप्पे लड़ाने का । #चटपटी_हिमाचली_गप्पें

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बागी में स्थानियों के बीच ⓒ Sanoj vazhiyodan

जहां एक तरफ आग जल रही थी वहीँ दूसरी तरफ स्थानियों के मन में सवाल सैलाब उबल रहा था । आग के पास बैठते ही उन्होंने सवाल बर्फ की तरह बरसाने शुरू कर दिए । हमारे होंठों पे मुस्कान गुलाटियां मारने लगी उनके सवाल सुनकर क्योंकि उनके हिसाब से तो हम कल ही कहीं रास्ते में फंसकर अपनी जान गवां बैठे थे । हम फंस गये थे ये सच था लेकिन जान को गवांना ये हमने होने न दिया । एक-एक करके सभी के सवालों के जवाब दिए और इजाजत मांगी वापस मंडी की ओर जाने की । हम खुश थे, स्थानीय खुश थे, सभी ने ख़ुशी-ख़ुशी हाथ मिलाकर हमें अलविदा कहा । अब ये तो लिखना ज्यादा हो जायेगा कि ‘उन्होंने हमारे हौसले की तारीफ भी की’ ।

बागी से मंडी
दोपहर 2:45 पर हमने बैगों को साइकिल और कन्धों पे लाधकर मंडी की वापसी शुरू करी । कटौला पहुंचते-पहुंचते मौसम फिर से मूड में आ गया । बारिश शुरू होते ही एकलौते दांतों के सेट में भयंकर वाइब्रेशन शुरू हो गयी । ठंडा मौसम पिछले 3 दिनों से पसलियों के दर्द को रुकने ही नहीं दे रहा है ।
शायद कमान्द थी वो जगह जहां से दो-ढाई किमी. की तीखी चढ़ाई शुरू होती है । ये जीप-ट्रैक था, कच्चा, दीवारनुमा रोड़ के साथ । यहाँ ओले शुरू हो गये थे, ये सच में तेज थे और बड़े भी । तेज हवा, बारिश और ओलों ने 5 फीट दूर देखना भी कठिन कर दिया जिस वजह से हमें साइकिल से उतरना पड़ा ।
अब बस बहुत हो गया, अब और साइकिल नहीं चल सकती इस दीवार पर, रुक गये और तीनों ने मिलकर फैसला किया कि इस रोड़ के टॉप तक लिफ्ट ले लेते हैं । लिफ्ट के चक्कर में हमें दीवार पर डेढ़ किमी. चढ़ना पढ़ा तब जाकर एक ऑटो वाले ने हमने लिफ्ट दी, 50 रु. चुकाकर हमें डाउन-हिल का असली मज़ा मिलेगा । मंडी हम 4:21 पर पहुंचे, सारा रास्ता उतराई से लैस था ।

मंडी से दिल्ली
मंडी तक बारिश ने हमारा साथ नहीं छोड़ा । वहां पहुंचकर पता चला कि यहाँ भी 2 दिन पहले से मौसम खराब है और लगातार बारिश हो रही है । 3 घंटे इंतजार करना पड़ा बस के लिए, 6:24 पर जैसे-तैसे तीनों साइकिलों को बस की छत्त पर बाँध दिया । तीनों साइकिलों का किराया यहाँ से भी 300 प्रति साइकिल ही रहा ।
जिन सपनों के साथ ये एडवेंचर शुरू किया था अब मन बिलकुल ही अलग दिशा में सोच रहा था । आते वक़्त मन विचारों और योजनाओं में उलझा एक ऊन का गोला बना हुआ था और अब जाते वक़्त कुछ भी नहीं ‘एकदम खाली’, एक सीधी रेखा । जिन सपनों के साथ घर से चले थे इस सफ़र ने हमें उनसे कहीं ज्यादा दे दिया था । इतना मिला कि हमें इससे सीखने को बहुत कुछ मिला । #अब_बदलेगी_सोच

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xbhp मैगज़ीन का लिंक ⓒ Rohit kalyana

इस सफ़र को प्रिंट होने का मौका भी मिला, जिसका सारा श्रेय धनुष को जाता है । पहला मौका xbhp  ने दिया प्रिंट वर्जन में जगह देकर ।

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mtbmagindia मैगज़ीन का लिंक ⓒ Rohit kalyana

दूसरा मौका mtbmagindia ने दिया इसे ऑनलाइन पब्लिश करके, यहाँ भी सारा श्रेय धनुष को ही जाता है जिसने सारा कन्टेन्ट खुद लिखा ।

तो अब आखिर में वही पुरानी लाइन दोहराता हूँ । “आशा करता हूँ हमारा ये सफ़र आप सभी को बेहद पसंद आया होगा, कृपया यहाँ आते रहिये और इस ब्लॉग की शोभा बढ़ाते रहिये । आप सभी का आगमन है तो मैं इसे चलाने की कोशिश कर रहा हूँ । खुश रहें, साथ रहे । गर्भ में स्वागत है, धन्यवाद” ।

30 comments:

  1. रोंगटे खड़े करा देने वाली यात्रा। खैर, अंत भला तो सब भला।

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    1. जी बिलकुल ठीक कहा, ये तो बिलकुल हमारी हिंदी फिल्मों की तरह हो गया...धन्यवाद् और शुभकामनायें

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  2. वाह मज़ा आ गया प्रत्यक्ष में यात्रा हो गयी , बहुत ही साहसिक और रोमांचकारी साइकिलिंग रही , १० परांठें के १००० रूपये इसी जगह के लिए वाजिब है
    आप को ह्रदय से बधाई

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    1. आपको भी अपने ह्रदय से धन्यवाद देता हूँ खन्ना साब

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  3. Ek sahasi yatra ka sunder lekh. Yatra ke vivran se bhi sunder.. yeh manobhawon ko padhna Aapke blog ko baakiyon se alag krta hai.

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    1. आपका यहाँ स्वागत है और इसे अलग मैं नहीं बनाता अलग तो इसे आपका मन बनाता है.....शुभकामनायें

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  4. वाह बहुत ही रोमांचक यात्रा।ऐसे ही अपने अनुभव साझा करके ज्ञानवर्धन करते रहिए।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद् अनिल जी, आप आते रहिये मेरी कोशिश जारी रहेगी

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  5. "अतीत का साथ अगर छोड़ भी देगा तो भविष्य की पुंछ पकड़ लेगा" यह बिलकुल सभी कहां रोहित भाई। मन हमेशा ही यात्रा करता रहता है। चाहे हम अपने घर पर ही क्यों ना हो। ये यात्रा करना नहीं छोड़ता...सुन्दर वर्णन

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    1. हा हा लगता है आपका मन भी मेरी ही तरह आवारा हो गया है...शुक्रिया कमेंट करने के लिए

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  6. सबकुछ बहुत बढ़िया था
    लेकिन जिस शख्स ने इतनी मदद की उसके लिए 20 बार पेड़ शब्द का प्रयोग करना जबकि उसका अपना एक नाम भी है सही नही लगा।
    आप सोचते है ये हास्य या विनोद भर रहा है जबकि इस से फूहड़ता ही नजर आयी
    पाठक सुझाव

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    1. अगर आपकी भावनाओं को ठेस पहुंची तो मांफी चाहूँगा मोहित जी

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  7. शानदार यात्रा

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  8. ग़ज़ब की जन्नत देख कर आये आप इस साहसिक यात्रा पर

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    1. सच में जन्नत है वो जगह....आशा करता हूँ आपका भी जन्नत का जीते जी चक्कर लगेगा...

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  9. ग़ज़ब की साहसिक यात्रा साहस ही ये सब करवाता है शुभकामनायेंशुभकामनायें🙏

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    1. साहस के बिना कुछ नहीं, शुक्रिया और शुभकामनायें

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  10. रोहित जी, रोमांच से भरा हुए सफर का पराशर झील दर्शन के साथ शानदार समापन, बेहतरीन लेखन शैली |

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    1. धन्यवाद् नितिन जी कमेंट के लिए और यहाँ आने के लिए, आपका स्वागत है गर्भ में...

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  11. रामसिंह जी उर्फ पेड, रामसिंह जी एक फलदार पेड निकले जिन्होंने आपको उस रात वो सब कुछ दिया जो आपको चाहिए था। रामसिंह जी उस दिन भगवान के रुप मेम वहाँ मौजूद थे
    ऐसी ही साहसिक यात्राएँ जीवन को सुरक्षित रख कर करते रहिए, रोहित भाई साल में एक साहसिक यात्रा करनी कभी मत छोडना,
    लेखन के बारे में कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है, आपकी कलम में वो सब कुछ है जो होना चाहिए। अपने खूबसूरत पलों को शब्दों में उतारना आपको बखूबी आता है, इसमें कभी आलस मत करियेगा।

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    1. संदीप भाई जी का स्वागत है, कितना खुबसूरत कहा अपने "रामसिंह जी एक फलदार पेड़ निकले"। काश ये पोस्ट लिखते हुए ये लाइन मुझे याद आती तो ज़रूर लिखता । शुक्रिया मेरी जानकारी के सर्किल को थोडा और बढ़ाने के लिए। मेरी लेखनी की शुद्ध अभिव्यक्ति आप सभी के ये कमेंट ही तो है जो मुझे आलस से दूर रहने में मेरी मदद करेंगे । एक और धन्यवाद् ब्लॉग की तरफ से नहीं बल्कि मेरी तरफ से....

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  12. रामसिंह जी जैसे लोगो को नमन है। ऐसे लोगो की वजह से ही बाहरी राज्य के लोगो के मन में प्रेम व विश्वास बनता है। रोहित भाई बेहद रोमांचकारी यात्रा वृतांत है यह पढकर मजा आया।10/10

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    1. घुमक्कड़ी के दौरान ये समझने में मदद मिली है कि शहरों में भी अच्छे प्राणी है लेकिन सभी अपने प्राणों को ही सींचने में लगे हुए जबकि पहाड़ों के लोग खुद के साथ-साथ हमारी सहायता करके हमारे मार्गदर्शन के साथ-साथ हमारा विश्वास भी अपने नाम कर रहे हैं । सचिन भाई आपके कमेंट का स्वागत है और आशा करता हूँ रामसिंह जैसे असली इन्सान हम सभी तो और ज्यादा देखने को मिलेंगे ।

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  13. Bhai aapki yaatra Pushkar man khush ho gya

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    1. धन्यवाद जी, स्वागत है इस नये नवीले ब्लॉग पर।

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